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KAithAl ------
मैं अपनी कहानियों किस्सों में उलझ गया हूँ बहुत ।
किस्से कहू कैसे कहू सोचता हु यही हर रोज़ ।।
कोई तो मंजिल कोई तो ऐसा मुकाम मिले ।
जहा जाके मेरी रूह को आराम मिले ।।
सुख-ओ-चैन की परवाह नहीं है मुझे ।
बस तेरे आने की एक आस मिले ।।
तू जहान है मेरा तुझे पा लिया तो सब पा लिया ।
तू मिले एक दफा तो लगे की खुदा का दर पा लिया ।।
इबादत तो नहीं करता हूँ में फिर भी खुदा आ के बोला,
हम तेरी इबादत से खुश है बोल क्या चाहिए ।
में तेरे ख्वाबो में ग़ुम, बोल जनाब आप जो भी हो आगे जाइये ।।
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